बहुचर्चित कृष्णा पांडेय हत्याकांड: ठोस साक्ष्य के अभाव में मुख्य आरोपी गजेंद्र सोरठे समेत सभी 6 आरोपी दोषमुक्त, कटघोरा न्यायालय का फैसला

 

कटघोरा/कोरबा /,सेन्ट्रल छत्तीसगढ़: चौकी कोरबी (थाना पसान) क्षेत्र के ग्राम कुरथा में घटित बहुचर्चित कृष्णा पांडेय हत्याकांड मामले में प्रथम अपर सत्र न्यायालय, कटघोरा (पीठासीन अधिकारी श्रीमती मधु तिवारी) ने अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा संदेह से परे आरोप साबित न कर पाने और पुलिस विवेचना में गंभीर खामियां पाए जाने के चलते मुख्य आरोपी गजेंद्र सिंह सोरठे समेत सभी 6 आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है।

क्या था मामला?

अभियोजन के अनुसार, 6 जनवरी 2025 की शाम ग्राम कुरथा में पंचायत के उपसरपंच रामकुमार और कृष्णा पांडेय मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। इसी दौरान हमलावरों द्वारा चलाई गई गोली कृष्णा पांडेय की पीठ में लगी, जिससे गंभीर हालत में इलाज के दौरान बिलासपुर सिम्स अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।

पुलिस ने दावा किया था कि ग्राम पंचायत की राजनीति और रंजिश के चलते गजेंद्र सिंह सोरठे ने उपसरपंच रामकुमार की हत्या की साजिश रची थी। इसके लिए उसने सूरजपुर से अवैध पिस्टल खरीदी और शिवप्रसाद उर्फ मोनू के जरिए शूटरों का प्रबंध कर वारदात को अंजाम दिलवाया, जिसमें निशाना चूकने से गोली कृष्णा पांडेय को लग गई। मामले में रामकुमार, राजकुमार, शिवप्रसाद उर्फ मोनू, गजेंद्र सिंह, विरेन्द्र कुमार आर्मो और बलिन्दर रजवाड़े को आरोपी बनाया गया था।

अदालत में क्यों टिक नहीं पाया पुलिस का केस?

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवेश केला व अन्य सहयोगियों ने पैरवी करते हुए पुलिस की जांच प्रक्रिया और जब्ती पर गंभीर सवाल खड़े किए:

  1. जब्ती और गवाहों का मुकरना: कथित घटना और पिस्टल जब्ती के प्रमुख गवाहों ने अदालत में पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया। गवाहों ने बयान दिया कि पुलिस स्वयं थाने से पिस्टल लेकर आरोपी के घर गई थी और वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए यह कार्रवाई कराई गई थी, जिससे बरामदगी प्रक्रिया पूरी तरह संदेहास्पद साबित हुई।
  2. संदेहास्पद बैंक ट्रांजेक्शन व जांच में चूक: गजेंद्र द्वारा हथियार खरीदने के लिए किए गए भुगतान के मामले में पुलिस किसी सुनील सिंह/जैन को न तो गवाह बना पाई और न ही आरोपी। इसके अलावा मेमोरेंडम बयान दर्ज होने से पहले ही बैंक स्टेटमेंट निकालने का तथ्य सामने आया, जिसे अदालत ने संदेहास्पद माना।
  3. कड़ियों का अभाव: अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की कड़ियों को एक-दूसरे से जोड़ने और आरोपियों की संलिप्तता को साक्ष्य विधि के तहत संदेह से परे प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल रहा।

न्यायालय का अंतिम आदेश

अपर लोक अभियोजक संजय जायसवाल और बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने तथा साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दांडिक न्याय व्यवस्था में मात्र संदेह या कमजोर साक्ष्यों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने निर्णय सुनाते हुए रामकुमार, राजकुमार, शिवप्रसाद उर्फ मोनू, गजेंद्र सिंह, विरेन्द्र कुमार आर्मो और बलिन्दर रजवाड़े को हत्या, आपराधिक षड्यंत्र और आर्म्स एक्ट के तमाम आरोपों से दोषमुक्त कर रिहा करने का आदेश दिया।