रेत परिवहन से जर्जर हुई सड़क की मरम्मत में जुटे रेत कारोबारी, शासन-प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

 

सेन्ट्रल छत्तीसगढ़   :. सूरजपुर के ग्राम कुरूवा (पंडित पारा) में जनप्रतिनिधियों और अफसरों की अनदेखी के बाद रेत कारोबारियों ने खुद संभाला सड़क सुधार का जिम्मा; ग्रामीणों ने की स्थायी पक्की सड़क निर्माण की मांग।

सूरजपुर। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच सूरजपुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कुरूवा के पंडित पारा से प्रशासनिक उपेक्षा की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां रेत घाट से भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के चलते पूरी सड़क छलनी हो चुकी थी। महीनों तक पंचायत से लेकर कलेक्ट्रेट और विधायक-सांसद के चक्कर काटने के बाद भी जब सरकारी तंत्र नहीं जागा, तो थक-हारकर रेत घाट से जुड़े कारोबारियों को ही स्वयं सड़क दुरुस्त कराने आगे आना पड़ा।

चौखट-चौखट भटके ग्रामीण, आश्वासन तक सीमित रहा सिस्टम

पंडित पारा स्थित रेत घाट से रेत के निरंतर उठाव और भारी ट्रकों-ट्रैक्टरों के दबाव से गांव का मुख्य मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुका था। ग्रामीणों के अनुसार, आवागमन में हो रही भारी दिक्कतों को लेकर उन्होंने:

  • ग्राम पंचायत सरपंच एवं सचिव से गुहार लगाई,
  • जनपद व जिला पंचायत कार्यालयों में ज्ञापन सौंपा,
  • कलेक्ट्रेट जनदर्शन में औपचारिक आवेदन दिया,
  • क्षेत्रीय विधायक एवं सांसद तक लिखित रूप से समस्या पहुंचाई।

इसके बावजूद किसी भी स्तर पर सड़क मरम्मत को लेकर कोई ठोस प्रशासनिक पहल नहीं की गई।

व्यवस्था पर तमाचा: जिनकी वजह से टूटी सड़क, वही बने ‘मसीहा’

हैरानी की बात यह है कि जिस मार्ग के निर्माण व संधारण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग या ग्रामीण विकास एजेंसियों की थी, वहां अब रेत कारोबारी अपने संसाधनों से पैचवर्क और मरम्मत करा रहे हैं। इसे लेकर क्षेत्र में चर्चा है कि यह कारोबारियों की मजबूरी है, दरियादिली है या फिर सरकारी महकमे की नाकामी का खुला प्रमाण। सड़क सुधरने से ग्रामीणों को फौरी राहत तो जरूर मिली है, लेकिन सरकारी मशीनरी की कार्यशैली कटघरे में खड़ी हो गई है।

ग्रामीणों की दो टूक: लीपापोती नहीं, स्थायी निर्माण और जवाबदेही तय हो

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि रेत कारोबारियों द्वारा किया जा रहा काम केवल कामचलाऊ मरम्मत है। बारिश या भारी वाहनों की अगली खेप आते ही सड़क दोबारा जर्जर हो जाएगी। ग्रामीणों ने मांग की है कि:

  1. मार्ग का तकनीकी मानकों के अनुरूप स्थायी डामरीकरण/कांक्रीटीकरण कराया जाए।
  2. रेत घाट संचालन के नियमों के तहत सड़कों के संधारण मद (DMF/CSR) की राशि के उपयोग की जांच हो।
  3. समस्या की अनदेखी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

अब देखना यह होगा कि रेत कारोबारियों द्वारा सड़क बनाए जाने की इस घटना के बाद कुंभकर्णी नींद में सोए जिम्मेदार विभाग जागते हैं या कुरूवा के ग्रामीण स्थायी समाधान के लिए आगे भी संघर्ष करते रहेंगे।

परिवहन से जर्जर हुई सड़क की मरम्मत में जुटे रेत कारोबारी, शासन-प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

सूरजपुर के ग्राम कुरूवा (पंडित पारा) में जनप्रतिनिधियों और अफसरों की अनदेखी के बाद रेत कारोबारियों ने खुद संभाला सड़क सुधार का जिम्मा; ग्रामीणों ने की स्थायी पक्की सड़क निर्माण की मांग।

सूरजपुर। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच सूरजपुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कुरूवा के पंडित पारा से प्रशासनिक उपेक्षा की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां रेत घाट से भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के चलते पूरी सड़क छलनी हो चुकी थी। महीनों तक पंचायत से लेकर कलेक्ट्रेट और विधायक-सांसद के चक्कर काटने के बाद भी जब सरकारी तंत्र नहीं जागा, तो थक-हारकर रेत घाट से जुड़े कारोबारियों को ही स्वयं सड़क दुरुस्त कराने आगे आना पड़ा।

चौखट-चौखट भटके ग्रामीण, आश्वासन तक सीमित रहा सिस्टम

पंडित पारा स्थित रेत घाट से रेत के निरंतर उठाव और भारी ट्रकों-ट्रैक्टरों के दबाव से गांव का मुख्य मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुका था। ग्रामीणों के अनुसार, आवागमन में हो रही भारी दिक्कतों को लेकर उन्होंने:

  • ग्राम पंचायत सरपंच एवं सचिव से गुहार लगाई,
  • जनपद व जिला पंचायत कार्यालयों में ज्ञापन सौंपा,
  • कलेक्ट्रेट जनदर्शन में औपचारिक आवेदन दिया,
  • क्षेत्रीय विधायक एवं सांसद तक लिखित रूप से समस्या पहुंचाई।

इसके बावजूद किसी भी स्तर पर सड़क मरम्मत को लेकर कोई ठोस प्रशासनिक पहल नहीं की गई।

व्यवस्था पर तमाचा: जिनकी वजह से टूटी सड़क, वही बने ‘मसीहा’

हैरानी की बात यह है कि जिस मार्ग के निर्माण व संधारण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग या ग्रामीण विकास एजेंसियों की थी, वहां अब रेत कारोबारी अपने संसाधनों से पैचवर्क और मरम्मत करा रहे हैं। इसे लेकर क्षेत्र में चर्चा है कि यह कारोबारियों की मजबूरी है, दरियादिली है या फिर सरकारी महकमे की नाकामी का खुला प्रमाण। सड़क सुधरने से ग्रामीणों को फौरी राहत तो जरूर मिली है, लेकिन सरकारी मशीनरी की कार्यशैली कटघरे में खड़ी हो गई है।

ग्रामीणों की दो टूक: लीपापोती नहीं, स्थायी निर्माण और जवाबदेही तय हो

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि रेत कारोबारियों द्वारा किया जा रहा काम केवल कामचलाऊ मरम्मत है। बारिश या भारी वाहनों की अगली खेप आते ही सड़क दोबारा जर्जर हो जाएगी। ग्रामीणों ने मांग की है कि:

  1. मार्ग का तकनीकी मानकों के अनुरूप स्थायी डामरीकरण/कांक्रीटीकरण कराया जाए।
  2. रेत घाट संचालन के नियमों के तहत सड़कों के संधारण मद (DMF/CSR) की राशि के उपयोग की जांच हो।
  3. समस्या की अनदेखी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

अब देखना यह होगा कि रेत कारोबारियों द्वारा सड़क बनाए जाने की इस घटना के बाद कुंभकर्णी नींद में सोए जिम्मेदार विभाग जागते हैं या कुरूवा के ग्रामीण स्थायी समाधान के लिए आगे भी संघर्ष करते रहेंगे।