अपने ही कार्यालय में प्रवेश अपराध नहीं, युवा भाजपा नेता उमेश यादव के खिलाफ दर्ज फर्जी FIR हाईकोर्ट ने की निरस्त, मिली बड़ी राहत

अंकित सिंह, विशेष संवाददाता

कोरबा।
युवा भाजपा नेता उमेश यादव के खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक दर्ज की गई एफआईआर को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने निरस्त करते हुए उन्हें बड़ी राहत दी है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अपने ही कार्यालय में प्रवेश करना किसी भी स्थिति में अपराध नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब मामला साझेदारी और व्यावसायिक विवाद से जुड़ा हो।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच, जिसमें माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु शामिल थे, ने थाना सिविल लाइन, कोरबा में दर्ज अपराध क्रमांक 0527/2024 को पूरी तरह निरस्त कर दिया। यह एफआईआर 03 सितंबर 2024 को भारतीय न्याय संहिता 2023 की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत दर्ज की गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि उमेश यादव एवं उनके सहयोगी लंबे समय तक “वंदे मातरम् केबल नेटवर्क” से जुड़े रहे हैं और फर्म के वैध साझेदार थे। साझेदारी को लेकर उत्पन्न मतभेद के बाद प्रतिवादी द्वारा सीधे आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें जबरन कार्यालय में घुसने, मारपीट करने और उपकरणों की लूट जैसे आरोप लगाए गए थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि यह एफआईआर दुर्भावना से प्रेरित होकर केवल दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि साझेदार को अपने ही कार्यालय में प्रवेश करने से रोकना कानूनसम्मत नहीं है और ऐसे मामलों में आपराधिक धाराएं लगाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भजनलाल प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि जहां विवाद का मूल स्वरूप नागरिक या व्यावसायिक हो, वहां आपराधिक कार्यवाही नहीं चलनी चाहिए।
अदालत ने यह भी माना कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है और पूरा मामला व्यावसायिक विवाद को आपराधिक रंग देने का प्रयास प्रतीत होता है। इसी आधार पर एफआईआर को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को आपराधिक कार्यवाही से मुक्त कर दिया गया।
उल्लेखनीय है कि उमेश यादव भाजपा युवा मोर्चा कोरबा के पूर्व उपाध्यक्ष रह चुके हैं और लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आगामी दिनों में उन्हें युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिल सकती है। ऐसे समय में हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।